Thursday, January 29, 2015

मृगतृष्णा

मन की मेरे मन ही जाने
दूजा जाने ना
मन बैरी बन दर दर भटके
कहना माने ना
दूर अंधेरे मन के मेरे
कर दे ओ कृष्णा
सच मन का मैं तब ही जानू
तोड़ू मृगतृष्णा....

मन की मानी

हां मैंने बस मन की मानी
तोड़ी सारी रीत पुरानी

साथी बैरी भए हमारे
अनजाना मनमीत बना रे

गुड़िया हो गई देख सयानी
चलेगी ना अब तेरी मनमानी

Wednesday, June 18, 2014

कुछ खो गया है

कुछ खो गया है अंदर का
 ढूंढ रही हूं  मैं अरसे से

मन कस्तूरी बन है भटका
नैन मचल रहे हैं तरसे से

बंजर धरती कैसे बताये
क्यों लगते बादल  बरसे से

भीतर घना अंधेरा छाया
बाहर फैली है रौनक, चारो ओर चलते जलसे से 

Sunday, December 29, 2013

इठलाएगी भोर

ज़िन्दगी हमसे रूठी रही न जाने किस बात पे 
हम भी उसे मनाते रहे शिद्दत से, जज़बात से 

हार मानेंगे नहीं, हमको ये कसम है 
काफिरों से कह दो की जिगर में बाकी अभी दम है 

ये दावा है अपना कि कभी वक़्त लेगा करवट हमारी ओर 
घना अँधेरा चीरकर, इठलाएगी भोर।। 

Friday, December 27, 2013

हम इश्क़ हैं

जब तक दिलों में रोशन है चिराग-ए-उम्मीद
मायूसी के अँधेरे यूँ ही लरजते रहेंगे।

सेहराओं में भी बरसती है घटाओं की मोहब्बत
ऐसा नहीं है के वो तरसते रहेंगे।

हमें खामोश करने के लिए मौत कि नींद सुलाना होगा
जिगर में जब तक दम है हम गरजते रहेंगे।

नफरतों की आंधी हमें नहीं मिटा सकती
हम इश्क़ हैं, भरी बरसात में भी सुलगते रहेंगे।

Thursday, December 5, 2013

जज़बात बदल जाते हैं...

वक़्त बदलता है, हालात बदल जाते हैं,
लोग कहते हैं कि, जज़बात बदल जाते हैं...

दुनिया को नज़र आते हैं जो अलग,
पर्दा गिरते ही वो किरदार बदल जाते हैं...

नया बन जाता है वो शख्स जो मोहब्ब्त करता है
प्यार में इंसान के दिन रात बदल जाते हैं...

बाज़ीगर थामे रहता है मोहरों कि बागडोर
कोई नहीं जानता कब बिसात बदल जाते हैं...

Friday, November 29, 2013

गुलज़ार ज़िंदगी

ज़िंदगी कभी आर कभी पार चली जाती है
कभी यूँ  ही मझदार में बिछड़ जाती है

ख्वाबों से सजी लगती है ये दुल्हन मुझको
पलकों की कश्ती में सवार चली जाती है

अनगिनत रंगो का खज़ाना है ये
हर बार मुझे नए रंग में सराबोर कर जाती है

मैं चाहती हूँ ज़िंदगी को बहार कि तरह
वो जब भी आती है तो फ़िज़ा गुलज़ार कर जाती है...