Monday, November 21, 2011

हर रिश्ता ये कहकर दूर हो गया मुझसे
के तुझमे ताक़त है खुद को हौसला देने की....

मुझे किसी कंधे का सहारा ना मिला क्योंकि
सबको आदत थी मेरे कंधो का सहारा लेने की....
 

मैं वो पेड़ हूँ, जिसकी छाँव में मुसाफिर
घडी दो घडी सुस्ता लेते हैं...

मगर पेड़ किसी का हमसफ़र नहीं बनता...
सवेरा होते ही सबको जल्दी होती है मंजिल पर पहुचने की....

मेरा एक हिस्सा

मेरा एक हिस्सा तुझसे बिछडऩे के गम में सिसकता रहा लेकिन
दूजा तुझे सामने देखकर मुस्काता रहा....

तुझको खो देने का गम मुझे पागल करता रहा पर
तेरी मुस्कराहट देख सारा दर्द जाता रहा....

तेरी जुदाई के एक-एक पल में मौत मांगी मैंने
और तेरी एक झलक की खातिर मैं सांस लेता रहा...

मैं खत्म और खोखला हो गया था फिर भी
तेरे मांगने पर अपना आखिरी कतरा तक देता रहा...

मुझे मालूम था कि तू आगे बढ़ जाएगा छोड़कर मुझे
फिर भी तेरे कहने पर मैं शब भर जागता रहा...

तू मिराज था, तुझे तो धोखा देना ही था पर
मैं ये जानते हुए भी तेरे पीछे बेतहाशा भागता रहा...

अब खत्म सा हूं लेकिन थोड़ा नामो-निशां बाकी है मेरा
मुझे मालूम है के ये भी लुटा दूंगा तुझपर...

ये तय था कि तेरी खामोश अदा, बोलती आंखें
एक दिन मेरी जान यूं ही लेंगी दिलबर...

Saturday, November 19, 2011

(भोपाल के बड़े तालाब को समर्पित)

तुम बेहद खूबसूरत हो... विशाल, अथाह...
जब भी तुम्हे देखती हूँ तो 
तुम्हारे लिए मेरा प्यार और बढ़ जाता है
तुम्हारी गहराई... शांति से मेरी बातें सुनना 
और सबकुछ खुद में जज़्ब कर लेना
इन्ही खूबियों की वजह से मैं तुम्हे कभी 
छोड़ नहीं पाती... 
जब किसी और शहर जाती हूँ तो 
तुम्हारी कमी मुझे बेहद खलती है
मैं दुआ करती हूँ की तुमसे मेरा रिश्ता 
हमेशा यूँ ही बरक़रार रहे....

तुम इस पल आज हो

तुम इस पल आज हो, कल अतीत हो जाओगे
मैं आगे बढ़ जाउंगी और तुम मुझे रोक ना पाओगे...

जो गुज़र जाता है वो लौटता नहीं कभी
मुझे पता है की तुम भी लौटकर ना आओगे...

ये क्षण जो है मेरा है आगे भी एक नया सवेरा है..
तुम भी कल को आगे बढ़कर अपना क्षितिज बनाओगे..


प्रेम हम्रारे जीवन को कर गया सूना लेकिन
मुझे यकीन है तुम कल को किसी का जीवन सजाओगे 

मै भी भर लुंगी रीते मन को किसी के स्नेहिल उद्गारों से 
सुनहरे कल में जब हम मिलेंगे तो तुम मुझे पहचान न पाओगे...  

Monday, November 7, 2011

कुछ अधूरा सा...


कुछ ख्वाब अनछुए से, कुछ पल अन जिए से
कुछ लफ्ज अनकहे से, कुछ खत अधजले से

वो रात थी जगी सी, वो दिन थे नए से
अहसास अधजगे से, लब अधखुले से

ख्वाहिशें अधपकी सी, कुछ हक अन दिए से
वो प्याले पीछे छूटे, जो थे अन पिए से....

Thursday, November 3, 2011


मेरे दोष भी मेरे, उपलब्धि भी
मेरे भ्रम भी मेरे, बुद्धि भी।।

मेरे पाप भी मेरे और शुद्धि भी
मेरा पतन भी मेरा, वृद्धि भी।।

मेरी तपस्या भी मेरी, सिद्धि भी
दीन समय भी मेरा, समृद्धि भी।।

मैं थी, मैं हूं, मैं रहूंगी...

सागर हूं मैं 
मेरा मंथन करता है समय
कभी विषाक्त हो जाती हूं
तो कभी धन-धान्य बरसाती हूं
मुझे विश्वास है कि एक दिन
मैं अमृत बन भी बहूंगी
मैं थी, मैं हूं, मैं रहूंगी...

सच्चा इंसान वही है...

गिरना, उठना, उठकर संभलना
संभलकर आगे बढऩा ही सही है
जो ऐसा कर पाए
सच्चा इंसान वही है...

भूल हुई मुझसे अनेक
पर अब भी संग है मेरा विवेक
राह नई जरूर है पर मंजिल वही है
जो निरंतर चलता जाए इंसान वही है....

उम्मीद टूटी है मगर,
हौसला बरकरार है
किनारे पर जरूर पहुंचेगा
जो अभी फंसा मझधार है

दूसरों की तरह ही
ऊपरवाले ने मेरी भी किस्मत लिखी है
जो उसपर भरोसा कर बढ़ता जाए
सच्चा इंसान वही है....