Monday, June 27, 2011

वो लड़की कहां खो गई...

जिंदगी के सफर के
इस पड़ाव पर आकर सोचा
थोड़ा ठहर लूं मैं
और आराम फरमा लूं जरा

एक जगह छांव में बैठकर
सुस्ताते हुए सोचा के
इस बहाने नफा नुकसान भी
जोड़ लूं जिंदगी का

देखा तो बहुत पाया था
बचपन के दौर में मैंने
दोस्त, साथी, हमसफर और
परिवार के साथ तय किया मैंने वो सफर

कदम जवानी के दौर में
जब रखा मैंने लापरवाही से
तो सोचा भी न था कि
बहुत कुछ जल्द बदलने वाला है

अचानक देखा तो जिंदगी का मौसम
रुख बदलने लगा था
तेज हवाओं के उस मौसम ने
मेरे अंदर की नमीं चुरा ली थी

यहीं नहीं रुका मौसम का खिलवाड़
आंधी-तूफानों और झंझावतों ने
मेरे निश्छल और नाजुक मन को
बिल्कुल दिया उजाड़

रही सही कसर कहीं
आगे पूरी हो गई
और मेरे अंदर रहने वाली लड़की
न जाने कहां खो गई....

थोड़ा वक्त अपने साथ गुजार लूं

आंखें बंद कर जरा देर
बीते वक्त को निहार लूं
जी करता है आज थोड़ा वक्त
अपने साथ गुजार लूं...

पलों में कैद है जिंदगी और
जिंदगी चंद पलों में बीत जाती है
जो पल छूट जाते हैं हमसे
याद उनकी बड़ा सताती है...

उन यादों पर चढ़ी धूल को
जरा सा मैं बुहार लूं
जी करता है आज थोड़ा वक्त
अपने साथ गुजार लूं...

जो चेहरे कभी बेहद प्यारे थे हमें
आज सिर्फ उनकी परछाई नजर आती है
न जाने क्यों उन चेहरों की याद
वक्त के साथ धुंधली पड़ती जाती है

उन चेहरों की तस्वीरें
अपने दिल में उतार लूं
जी करता है आज थोड़ा वक्त
अपने साथ गुजार लूं...

Thursday, June 23, 2011

ये इश्क वो बला है...

अफसाने हकीकत में बदल जाते हैं
जब प्यार में दीवानापन शुमार होता है
आशिक और माशूक एक-दूजे में ढल जाते हैं
जब दोनों पे चढ़ा इश्क का खुमार होता है...

यूँ तो लगते हैं सभी खुश जब इश्क होता है
लेकिन सब जानते हैं की इसमें दिल बीमार होता है
दुनिया बदलने की फिराक में रहते हैं ये जोड़े
इनपर एक किस्म का जूनून सवार होता है...

भूला बिसरा भी आ जाता है राह पर
जब उसे इश्क का बुखार होता है...
ये वो बला है जो लगे तो
यार पर तन मन धन सब निसार होता है...

बाहर मेघ बरसें, भीतर बरसे नैन...

बाहर मेघ झमाझम बरसे
मन भी मेरा बिरहा में तरसे
दिल पर उदासी के बादल ऐसे छाए
के आँखों की बारिश से दामन भीगा जाए...

पहली बारिश होते ही हर बार
ढह जाए जाने क्यों अतीत-वर्त्तमान के बीच की दीवार
यादों का सैलाब मुझे खींच ले जाए
और तड़पता छोड़ दे मुझे मझधार...

तभी तो ये बावरा मन
हर बारिश में बौराए
पिया की याद सदा ही मुझपर
दर्द घना बरसाए...

Tuesday, June 21, 2011

खुदा मेरा भी है यारों...


ऐसा हो नहीं सकता के दुनिया में
हर कोई दिल्लगी करके, फिर दगा देगा
खुदा मेरा भी है यारों
मुझे ऐसे न सजा देगा

वो पत्थर की मूरत है
मगर उसमें दिखती मां की सूरत है
वो जानता है के मुझको
कब उसकी जरूरत है

ऐसा नहीं है के मैं रोऊं
तो वो देखकर मजा लेगा
खुदा मेरा भी है यारों
मुझे ऐसे न सजा देगा

परखता है वो यूं ही मुझको
मेरी ताकत से वो वाकिफ है
मगर मैं लडख़ड़ाऊं तो
होती उसको भी तकलीफ है

मेरी भी जीत जब होगी
तो मुझको गले लगा लेगा
खुदा मेरा भी है यारों
मुझको ऐसे न सजा देगा

कुछ सांसें अब भी बाकी हैं....

इस दिल की वीरानियों में
आबाद होने का जुनूं बाकी है
के तुम लौटोगे फिर इक दिन
यही सोचकर इसमें कुछ सुकूं बाकी है

हमारे सपनों का वो घर
टूट के बिखर जाता मगर
जालों की हिफाजत में
अब भी खड़ा है वो सिर ऊंचा कर

ये घर बसेगा इक दिन
यह आरजू अब भी बाकी है

मेरे आसपास आज जो हैं
खुश हैं और आबाद भी वो है
मेरी वीरानियों में मगर तुझसे मिलने की
जुस्तजु अब भी बाकी है

तेरे मिलने की ख्वाहिश की खातिर
कुछ सांसें अब भी बाकी हैं....

तेरी आंखों का वो सुरमा

तेरी आंखों का वो सुरमा
अंधियारी रात के जैसा
जो फैला तो दिन में भी
जैसे रात हो गई

इन आंखों की नमीं देख
बादल भी पिघल गए
बदला यूं मौसम की
बरसात हो गई

ये आंखें भी हैं अजीब
जो मुझसे बात करती हैं
तू जब भी देखे पलट मुझको
तो तुझसे बात हो गई

दिल चाहता है बस यही
कि तेरी आंखों में भी चमक हो
ये उसका भी दिल जीतें
जिससे मात हो गई...

बेलगाम ख्वाहिशें...

उमड़ते बादलों को देखकर
मन में घुमड़ उठती हैं ख्वाहिशें भी
इस रुमानी मौसम में
कोई गले लगाता हमको भी

सुलग उठते हैं वो अरमां
जो ठंडे थे कई बरसों से
सालों के वो बंधन
खुलने लगे हैं कल-परसों से

मैं खुद से हार जाती हूं
मगह अहसास जीत का होता है
उन्मुक्त हो मेरा मन जब
रंगीन सपने संजोता है

डर लगता है इन सपनों से
मगर दिल कब ये सुनता है
हजारों ख्वाहिशों का ये तो
ताना-बाना बुनता है...

Monday, June 20, 2011

अनोखा प्यार...

इक रोज गजब बड़ा
यार हो गया
एक आशिक को मुजस्समे से
प्यार हो गया

जिस रोज उसे देखा,
वो देखता ही रह गया
कुछ समझ न पाया क्यों
दिल उससे लग गया

खुद भी समझ न पाया वो
यूं दिल पे किसका इख्तेयार हो गया
उसकी कशिश में क्यों बंधा
क्यों उससे प्यार हो गया

संगमरमर के उस बुत में
कुछ बात ही अलग सी थी
जो दिल को छू जाए
मासूमियत कुछ ऐसी उसमें थी

उस मासूमियत ने उसे यूं छुआ
कि वो ज़ार ज़ार हो गया
और वो संभल न सका
उसे उससे प्यार हो गया...

दिल बना परवाना

कुछ कहने को हरदम मचलता है
जिस राह रोकूं, उस राह पर ही चलता है
कितना भी संभालूं, अब नहीं संभलता है
दिल मेरा अब परवाना बनके जलता है....

बंदिशों में रहकर बागी हो गया है
बंद ताले से निकलकर ये कहीं खो गया है
पत्थर था, न जाने किस अहसास से ये गलता है
दिल मेरा अब परवाना बनके जलता है...

तन्हा रहता था, कोई शोर भी ना करता था
छोटी-बड़ी हर चोट से ये डरता था
मगर अब न जाने क्यों संभाले नहीं संभलता है
दिल मेरा अब परवाना बनके जलता है...

मौसम का जादू...

ये मौसम की नजाकत है या कुछ और
के दिल में जागे हैं अरमां कुछ नए से...

यूं तो हर बात कही सुनी है हमने मगर
कुछ जज्बात अब भी हैं अनकहे से...

कभी ऐसा भी था कि जबां रुकती न थी अपनी
अब लरजने लगे हैं होंठ कुछ भी कहने से...

पलकों को उठाने की हिम्मत नहीं होती
इनमें बंद हैं चंद हसीं ख्वाब नए से..

कुछ ऐसा जादू किया है फिजाओं ने हम पर
लोग कहते हैं कि हम भी लगे हैं कुछ बदलने से...

Wednesday, June 15, 2011

उस रोज़ कहा था तुमने

उस रोज़ कहा था तुमने 
धीरे से मेरे कानो में..
के एक दिन हम भी बनायेंगे 
एक आशियाना, पहाड़ों में....

दिन भर की मेहनत कर 
पहुचेंगे जब उस घर
मिलेगा वो सुकून हमको
जो मिलता नहीं अक्सर दूजे ठिकानों में...

तुम्हारे हाथ की कॉफ़ी
बनेगी और भी मीठी 
और अपनी रसोई भी
महकेगी पकवानों से...

ये सपने जो हैं सारे
बंद है आँखों में हमारे
आज भी देख लेते हैं
हम इन्हें रात के वीरानो में...

कभी कभी सोचती हूँ

कभी कभी सोचती हूँ के
गर अँधेरा अगर नहीं होता...
तो सूरज की अहमियत शायद
कोई नहीं समझता...
महरूम रह जाते सब
चांदनी के सुकून से
और जुगनू की चमक में
दिल मेरा नहीं खोता...

कभी कभी सोचती हूँ के
गर अँधेरा नहीं होता...
तो प्यार का वो अनोखा रंग
कहीं छुप जाता दिन के उजाले में
सुनहरी धुप तो मिलती
मगर तारे नहीं सजते आसमा के शामियाने में...
और कई सपने भी आँखों में 
कतरा जाते आने से...

जुदा लगते हैं रात और दिन
मगर वो एक दूजे के बिन अधूरे हैं 
दोनों की अपनी अहमियत है..
ज़िन्दगी में जिनकी ये दोनों हैं, वही पूरे हैं...

बारिश में मचलती ख्वाहिशें...


बदरा की गरजती बरसती धुन पर
थिरकती बरखा की बूँदें...
टपरों पर पड़ती उनकी थाप से उठता संगीत...
और इन् सबके साथ ताल मिलाने की हूक....

काश इस मौसम का मज़ा घर पर बैठकर नहीं 
बल्कि सड़कों पर घुमते हुए लिया जा सकता...
वहीँ बड़े तालाब के किनारे खड़े होकर या फिर
VIP रोड पर किसी का हाथ थामे टहलते हुए...

रिमझिम बारिश में होती एक लॉन्ग drive
भुट्टे की महक और बातों की लम्बी झड़ी...
कहीं रुक कर करते हम भी रेन डांस
और हम भी महसूस कर सकते इस मौसम का रोमांस..

तुम्हारी याद आती है...


अनजान राहों पर, चलते हुए यूँ ही
तुम्हारी याद आती है....
सड़क के किनारे पर, लगी उस बेंच को देखकर
तुम्हारी याद आती है...

मैं खड़ी थी फाटक पर, गई जब रेल गुज़रकर
तो याद आ गया मुझको, तेरे साथ का सफ़र...
उस सफ़र की यादें, गाहे बगाहे आ ही जाती हैं
मुझको बड़ा सताती हैं...

कभी लौटेंगे वो दिन भी
अभी उम्मीद है बाकी
दिल यही कहता है बार बार
जब भी तुम्हारी याद आती है...

Saturday, June 4, 2011

सौंधी सी खुशबु...

कहीं दूर से सौंधी सी खुशबु आई है मुझे
लगता है के मौसम बदलने वाला है...

धुप के नश्तर अब ना चुभेंगे मुझको
वो जल्द ही बादलों की चादर में छुपने वाला है...

रिमझिम फुहारों से तर होगी ज़मीं...
मेरा तन भी मन भी तर होने वाला है...

इस बार धरती को प्यासी ना रखना ऐ खुदा...
हमें मालूम है के बारिश की शक्ल में तेरा प्यार बरसने वाला है...

ख़ुशी!!!

आज अपने नसीब पर इठलाने को जी चाहता है...
खुश हूँ इतनी आज, के मेरा गुनगुनाने को जी चाहता है...

दुआओं भरा एक दिन नसीब हुआ है मुझे भी...
इस दिन को दिल में कैद कर लेने को जी चाहता है...

कुछ अपने भूल गए होंगे शायद मुझे लेकिन
अब गैरों की दुआओं से घर बसाने को जी चाहता है...

सोचा था की अब कोई ना बदल पायेगा मुझे
पर दोस्तों के प्यार की खातिर बदलने को जी चाहता है...