Wednesday, June 15, 2011

उस रोज़ कहा था तुमने

उस रोज़ कहा था तुमने 
धीरे से मेरे कानो में..
के एक दिन हम भी बनायेंगे 
एक आशियाना, पहाड़ों में....

दिन भर की मेहनत कर 
पहुचेंगे जब उस घर
मिलेगा वो सुकून हमको
जो मिलता नहीं अक्सर दूजे ठिकानों में...

तुम्हारे हाथ की कॉफ़ी
बनेगी और भी मीठी 
और अपनी रसोई भी
महकेगी पकवानों से...

ये सपने जो हैं सारे
बंद है आँखों में हमारे
आज भी देख लेते हैं
हम इन्हें रात के वीरानो में...

2 comments:

  1. hi,
    mam i went through your poem 'us roz kaha tha tumne' in which you have depicted your desire of having an 'ashiana' among the hills so i would like to invite you at shimla at my 'ashian'a among the hills.
    with regards
    chhavi sharma
    (mother of vrinda sharma)

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  2. Hello Chhavi ji...

    Thanks for the invitation. Whenever I'll come to shimla, I'll definitely visit your place...

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