Tuesday, October 10, 2017

बेमुकम्मल मोहब्बत

ना वो खामोशी की जुबां समझ सका
ना मुझसे लफ्जों में जज़्बात बयां हुए...
ये सच है इश्क दोनों को था,
मगर हमारे मिलने के हालात ही कहां हुए...
कुछ हलचल तो हुई थी इस जहां में
जब नजरें दो चार हुई थीं...
मगर यायावरी तेरी फितरत थी
सो मेरे इरादे बस दर्द में फना हुए...

एक बार तो सुन लो, वो जो मैं कह न सकी....

सुनो,
अगर तुम इस मौसम में थोड़ा इश्क छिड़क देते
तो बारिश में धुले रंग कुछ और निखर जाते...
अगर इस कुनकुनी सी ठंड में जो दोनों एक लिहाफ ओढ़ लेते
तो शीशे पर जमी भाप पर एक दिल बना पाते...

सुनो ना,
अगर तुम केसर की छोटी डिब्बी में प्यार भरकर दे देते
तो जिंदगी के कई साल उसकी खुशबू से महक जाते...
अगर तुम उस दिन कुछ और वक्त तक मेरी आंखों में देख पाते
तो शायद मेरी तरह तुम भी मोहब्बत की गिरफ्त में आ जाते

अगर तुम ये सारी बातें सुन पाते
जो जानते कि हर उस पल जब तुम पास होकर भी दूर थे
मैं तुम्हारे करीब आने का इंतजार कर रही थी
उस वक्त अगर तुम वॉट्स एप की जगह मेरी बातें सुन लेते
तो शायद वो सुन पाते जो मैंने नहीं कहा था....

Thursday, January 29, 2015

मृगतृष्णा

मन की मेरे मन ही जाने
दूजा जाने ना
मन बैरी बन दर दर भटके
कहना माने ना
दूर अंधेरे मन के मेरे
कर दे ओ कृष्णा
सच मन का मैं तब ही जानू
तोड़ू मृगतृष्णा....

मन की मानी

हां मैंने बस मन की मानी
तोड़ी सारी रीत पुरानी

साथी बैरी भए हमारे
अनजाना मनमीत बना रे

गुड़िया हो गई देख सयानी
चलेगी ना अब तेरी मनमानी

Wednesday, June 18, 2014

कुछ खो गया है

कुछ खो गया है अंदर का
 ढूंढ रही हूं  मैं अरसे से

मन कस्तूरी बन है भटका
नैन मचल रहे हैं तरसे से

बंजर धरती कैसे बताये
क्यों लगते बादल  बरसे से

भीतर घना अंधेरा छाया
बाहर फैली है रौनक, चारो ओर चलते जलसे से 

Sunday, December 29, 2013

इठलाएगी भोर

ज़िन्दगी हमसे रूठी रही न जाने किस बात पे 
हम भी उसे मनाते रहे शिद्दत से, जज़बात से 

हार मानेंगे नहीं, हमको ये कसम है 
काफिरों से कह दो की जिगर में बाकी अभी दम है 

ये दावा है अपना कि कभी वक़्त लेगा करवट हमारी ओर 
घना अँधेरा चीरकर, इठलाएगी भोर।। 

Friday, December 27, 2013

हम इश्क़ हैं

जब तक दिलों में रोशन है चिराग-ए-उम्मीद
मायूसी के अँधेरे यूँ ही लरजते रहेंगे।

सेहराओं में भी बरसती है घटाओं की मोहब्बत
ऐसा नहीं है के वो तरसते रहेंगे।

हमें खामोश करने के लिए मौत कि नींद सुलाना होगा
जिगर में जब तक दम है हम गरजते रहेंगे।

नफरतों की आंधी हमें नहीं मिटा सकती
हम इश्क़ हैं, भरी बरसात में भी सुलगते रहेंगे।

Thursday, December 5, 2013

जज़बात बदल जाते हैं...

वक़्त बदलता है, हालात बदल जाते हैं,
लोग कहते हैं कि, जज़बात बदल जाते हैं...

दुनिया को नज़र आते हैं जो अलग,
पर्दा गिरते ही वो किरदार बदल जाते हैं...

नया बन जाता है वो शख्स जो मोहब्ब्त करता है
प्यार में इंसान के दिन रात बदल जाते हैं...

बाज़ीगर थामे रहता है मोहरों कि बागडोर
कोई नहीं जानता कब बिसात बदल जाते हैं...

Friday, November 29, 2013

गुलज़ार ज़िंदगी

ज़िंदगी कभी आर कभी पार चली जाती है
कभी यूँ  ही मझदार में बिछड़ जाती है

ख्वाबों से सजी लगती है ये दुल्हन मुझको
पलकों की कश्ती में सवार चली जाती है

अनगिनत रंगो का खज़ाना है ये
हर बार मुझे नए रंग में सराबोर कर जाती है

मैं चाहती हूँ ज़िंदगी को बहार कि तरह
वो जब भी आती है तो फ़िज़ा गुलज़ार कर जाती है... 

Saturday, October 26, 2013

हसरतें ऐसी ही होती हैं जो पूरी न हो सकें


दिल में कसमसाती रहें एक आह की तरह 
तीर सी चुभती रहें पैनी निगाह की तरह 

आग बनके कभी चैन को जलाती रहें 
दबी हुई प्यास को रह रह के जगाती रहें 

आँखों में कभी मिराज के धोखे की धूल भर दे 
और कभी भरे घाव में टीस सी पैदा कर दे। 

हसरतें अधूरी ही होती हैं, पूरी नहीं  
फिर भी इनके बिना ज़िन्दगी भी पूरी नहीं 

Thursday, May 10, 2012

परिंदा फिर से लौट आये...

उड़ने चला वो फिर पंख फैलाये
नए पुराने सभी दर्द बिसराए....

नई किरणों से चमकेगा एक सवेरा
पहाड़ों में कहीं सजेगा जब बसेरा....

मन को मिलेगी स्थिरता और शांति
तभी तो कहीं आएगी विचारों की क्रांति....

वो सच है, नहीं कोई फ़साना
लेकिन परिंदे को है अब उड़ जाना....

यहाँ के पत्ते बूटे रहेंगे राह बिछाये
शायद परिंदा फिर से लौट के आये... 

बस चलते जाना है..


ना हमराही है साथ,  ना मंजिल का ठिकाना है
मगर मुझे रुकना नहीं है, बस चलते जाना है..

हमसफ़र की ख्वाहिश हमें भी थी मगर
यहाँ किससे साथ चलने की उम्मीद करें..

हर शख्स यहाँ अपने दर्द  से बेदम है
हर मुस्कराहट के पीछे छिपा कोई फ़साना है...

दावा तो सभी करते हैं के हम साथ देंगे तुम्हारा
मगर जिसमे वाकई साथ देने का हो माद्दा 

इन पहचानो की भीढ़ में 
ना जाने वो इन्सान छिपा कहाँ है...

जिंदा हूँ मैं...


खुली हवा में सांस लेती हूँ तो लगता है जिंदा हूँ मैं
बढ़कर तुझे थाम लेती हूँ तो लगता है जिंदा हूँ मैं

छोटी छोटी हार कहीं मार देती है मुझे
हौसला तुझसे मिलता है तो लगता है जिंदा हूँ मैं

ये शोर, कत्लेआम और घिनौनी साजिशें
इनके बीच तुझे देख लेती हूँ तो लगता है, जिंदा हूँ मैं...

मेरे अन्दर का विश्वास...

वहीँ कहीं छुपा बैठा था मेरे अन्दर का विश्वास
मुझे लगा था जैसे खो दिया हो मैंने उसे, 
हमेशा के लिए....
आँख मिचौली खेलता है वो मेरे साथ हर वक़्त
जानती हूँ जबकि की वो लौट आएगा आखिर में...
फिर भी उसके खो जाने का डर 
सताता है मुझे हर बार
और मेरे अन्दर सबकुछ 
दरकने लगता है धीरे धीरे...
मगर इस बार मैं इस डर को डरा दूंगी
क्योंकि जानती हूँ की 
इस बार भी मेरा विश्वास लौट आएगा...

चिट्ठी सी वो याद...

एक पुरानी चिट्ठी की सी याद 
अब भी कहीं मन की तिजोरी में छिपा रखी है...
उस याद को गाहे बगाहे चुपके से 
तिजोरी से निकालती हूँ एक चोर की तरह... 
मन ही मन उसपर हाथ फेरकर
उसे ताज़ा करने की कोशिश करती हूँ....
हाँ, उस कोशिश में पुराने होते कुछ पल
तड़ककर गिर जाते हैं कहीं 
और फिर ढूंढे नहीं मिलते...
मैं जितना उसे सहेजकर रखना चाहती हूँ
हर बार उस याद से 
कुछ कम होता चला जाता है....

मतलबी दुनिया

किसी को गाडी-बंगला-कार चाहिए
किसी को ताकत-पैसा-सरकार चाहिए

कोई आगे बढ़ने को सियासत करे
कोई बनके मजलूम बगावत करे

कोई मारे सबको तीरों तलवार से
कोई करे हलकान शब्दों के वार से..

दुनिया में अब बसती सिर्फ तकरार है
सभी भूल बैठे होता क्या प्यार है....


Wednesday, February 15, 2012

....कुछ और चाहिए

थोडा सुकून चाहिए थोडा आराम चाहिए
मुझे ज़िन्दगी में अब एक मुकाम चाहिए...

सुबह की भाग दौड़ थका देती है मुझे
तेरे संग बिता सकूँ वो शाम चाहिए...

मशीनी ज़िन्दगी है, ना दिल है ना जज्बात
फिर से इंसा बन सकूँ ये इनाम चाहिए...

सुनहरी किताब में कहीं ज़िक्र नहीं मेरा
मुझे मेरे हिस्से का वहां नाम चाहिए

मेरे हिस्से के गम तो तुने दे दिए खुदा
अब मुझे मेरे हिस्से की खुशियाँ तमाम चाहिए....

वो मोहब्बत नहीं है...

मोहब्बत ज़िन्दगी है या सिर्फ एक सजा है
ये वो दौर है जिसमे चोट खाने में भी मज़ा है
सच्चों के लिए ये दो दिलों का मेल है
झूठों के लिए ये महज़ एक खेल है
रंग रूप बदला हो भले ही इसका
मगर आज भी पैमाना वही है
जो आग के दरिया से ना गुज़रे
वो मोहब्बत नहीं है...

कहते इसे मोहब्बत हैं...

दिल की सरसराहट है वो
और है वो जिस्म की तपिश

वो मीठा सा दर्द भी है
और है सीने की खलिश

जो हकीकत में तब्दील हो रहा
यही है वो अफसाना

यहाँ ज़िन्दगी सजा लगे
और मौत बने नजराना

ये वो जज्बा है जिसमे
बला की शिद्दत है

नाम तो बहुत है इसके मगर
कहनेवाले कहते इसे मोहब्बत हैं...

Saturday, February 11, 2012

उस मुलाकात का असर अब भी है

उस मुलाकात का असर अब भी है
मेरे हिस्से में सहर अब भी है

पेशानी की लकीरों में कुछ तो बात होगी
के हम पर ज़िन्दगी की नज़र अब भी है

पेचीदगियों में उलझने का गिला नहीं मुझे
मेरे घर में सुकून का बसर अब भी है

मंजिल मिल ही गई तो फिर रुकना होगा
शुक्र है मेरे हिस्से में सफ़र अब भी है...

खुदा हो जाऊं अगर हर डर पे फतह हासिल कर लूं
मैं इंसा हूँ, मुझमे बाकी कुछ डर अब भी है...